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गुवाहाटी में होगा दुर्गायन महोत्सव का आयोजन
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क्या व्यास का पुत्र व्यास नही बन सकता ?

राजा का बेटा राजा, किसान का बेटा किसान, फ़िल्म स्टार के बच्चे स्टार, नेता का बेटा नेता, मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री, डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, IAS/IPS के बच्चे भी उसी राह पर चलते हैं तो फिर एक कथावाचक का बेटा कथा क्यों नहीं कर सकता? इससे सबके पेट में दर्द क्यूँ होने लगा है? आरक्षण की सीढ़ी पीढ़ी-दर-पीढी चल सकती है लेकिन एक योग्य बालक अपनी पिता का काम नहीं सम्भाल सकता? मने हद ही कर देते हैं सब ! देवकीनंदन ठाकुर जी का बेटा देवांश किसी का हक तो मारने जा रहा है? कहीं नौकरी के लिए रोना/धोना करने नहीं जा रहा है? उसे व्यासपीठ की गद्दी विरासत में मिली है तो क्या दिक्कत है? क्या वह अपने घर की व्यास परंपरा को आगे बढ़ाए या उन नौकरियों के लिए मत्था खपाये जहाँ अधिकांश प्रतिभा या तो आरक्षण के तले कुचली जाती है या फिर परीक्षा से पहले ही लाखों करोड़ों में क्वेश्चन लीक होने से हार जाती है। अरे! बच्चे तो बचपन जो देखते आते हैं वही बनते हैं इसमें गलत क्या है? अगर यही कुछ और करता तो लोग कहते कि दुनिया को प्रवचन देने वाले अपने बच्चों में संस्कार नहीं भर पाये। कुछ समय पूर्व जब डॉ कुमार विश्वास जी ने कहा था कि बच्चों को रामायण की शिक्षा देनी चाहिए नहीं तो घर का नाम रामायण रखने से कुछ नहीं होता तो कई लोगों ने उनके बच्चों के रहन -सहन पर टीका टिप्पणी शुरू कर दी थी कि सबको रामकथा सुनाने वाले अपने बच्चों को संस्कार सिखाओ। धर्म हो, व्यवसाय हो या फिर कोई भी धंधा, पीढ़ियों से आगे बढ़ती जाती है। जितने भी व्यापारी हैं सबके बच्चे व्यापार की करते हैं, नौकरी वालों के बच्चे भी बहुत हद तक अपने अभिभावकों के ही रास्ते चलते हैं। जाहिर सी बात है कि देवकीनंदन ठाकुर के बेटे देवांश में बचपन से ही कथा प्रवचन के संस्कार पड़े हैं और अगर वह भी अपने पिता की राह पर चल रहा है तो इसमें बुरा क्या है? उसके अंदर प्रतिभा होगी तो अपने पिता से बड़ा कथावाचक बन सकता है. अगर प्रतिभा न हो बड़े बड़े नेता और अभिनेताओं के बच्चों को फ़्लॉप होते देखा है। देवकीनंदन ठाकुर ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर जो आश्रम खड़ा किया है उसे उनका बेटा नहीं तो कौन सम्भालेगा? किसी पर भी ओछी टिप्पणी करने से पहले खुद उसके लायक बन तो जाओ? किसी पर आप एक उँगली उठाते हो तो तीन तुम्हारी ओर ही स्वयं उठती है। राधे राधे पंकज प्रियम

राम मन्दिर: आस्था और समर्पण

राम मन्दिर: आस्था और समर्पण जो राम का नहीं, किसी काम का नहीं अयोध्या राम मन्दिर में चढ़ावे की चोरी से किसी भी सच्चे सनातनी का मन आहत जरूर है लेकिन आस्था में कोई कमी नहीं हुई है। भला चोर उच्चकों के कारण भगवान और मन्दिरो पर आस्था कम हो सकती है क्या? घर मे नौकर चाकर चोरी कर लें तो क्या हमें अपने घर और मातापिता के प्रति आस्था घट जाएगी क्या? जिन्होंने कुकर्म किया उन्हें आज नहीं तो कल कर्मो की सजा अवश्य मिलेगी लेकिन इसके लिए हम ईश्वर पर श्रद्धा कम कर देंगे क्या? जिन्होंने ईश्वर की चरणों में दान दे दिया तो फिर उसके बारे सोचना क्या? संविधान और कानून के हाथ से लोग भले बच सकते हैं लेकिन ईश्वर की लाठी से कोई नहीं बच सकता। प्रभु राम तो त्याग और मर्यादा की मूरत हैं, रामायण हमें त्याग, समर्पण, विश्वास और मर्यादा का पाठ पढ़ाता है। जिस प्रभु ने जन कल्याण हेतु एक क्षण में राजपाट छोड़कर वनवास ले लिया उनसे बड़ा धैर्यवान और त्यागी कौन होगा? भरत ने मिला हुआ राज्य त्यागकर राम की खड़ाऊं सर पे रखकर उनके आने तक स्वयं तपस्वी जीवन जिया। फिर चाहे।माता सीता हौ, भ्राता लक्ष्मण-उर्मिला या फिर परम् भक्त हनुमान हों, हर एक पात्र से हमें जीवन का पाठ पढ़ने को मिलता है। जिस प्रभु राम ने सोने की लंका जीतने से पूर्व ही विभीषण को दान कर दिया उन्हें तुच्छ सोने चांदी रत्न आभूषण की जरूरत है क्या? अयोध्या मंदिर के मामले में किसी बड़ी साज़िश से भी इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वर्षों बाद मन्दिर स्थापना के बाद से ही यह उन लोगों की आँख में खटक रहा है जिन्होंने जानबूझकर मन्दिर बनने नहीं दिया। कोर्ट के फैसले के बाद विरोधी तत्वों ने खुलेआम कह दिया था कि वे इस निर्णय को नहीं मानते और जब हुकूमत आएगी तो राम मन्दिर ध्वस्त कर दिया जाएगा। राम मंदिर हर ऐसे व्यक्ति की आंख की किरकिरी बना हुआ है जो नहीं चाहता था कि प्रभु राम का इतना भव्य मंदिर बने। मंदिर को बदनाम करने का हर सम्भव प्रयास जारी है। जिन्होंने राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था वे भी आज राम भक्त होने का स्वांग रचा रहे हैं। हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि हजारों कारसेवकों के बलिदान के बाद यह मंदिर बन सका है। मंदिर आस्था का केंद्र होता जहाँ केवल श्रद्धा, समर्पण और तपस्या होनी चाहिए। उसे पर्यटन बनाएंगे तो लूट खसोट होगी ही। मंदिर में सिर्फ पुजारी और सच्चे सेवादार होने चाहिए जिनकी ईश्वर में अटूट श्रद्धा हो, उसे पाप का भय होता है, वह कभी चोरी नहीं कर सकता। प्राचीन काल के हजारों मंदिर इसके उदाहरण है। मंदिरों में सदियों लोग सोने, चांदी, रत्न आभूषण अपनी श्रद्धा के अनुसार चढ़ाते रहे लेकिन जबतक मन्दिर पुजारियों के भरोसे रहा कभी चोरी की घटना नहीं हुई, हमारे मन्दिर इतने समृद्ध थे कि विदेशी आक्रांताओं ने सबसे पहले मंदिरों को ही निशाना बनाया। राजा महाराजाओं ने कभी भी भी मंदिरों में अपने मैनेजर नियुक्त कर उससे धन उगाही नहीं की, मंदिरों के चढ़ावे से गुरुकुल चलते थे। मन्दिर कोई होटल नहीं जहाँ व्यवस्था के लिए मैनेजर हों वहाँ तो सिर्फ सेवादार होने चाहिए। मंदिर की व्यवस्था हमेशा से वही पूरी ईमानदारी के साथ संभाल सकता है जिसको भगवान के प्रति पूर्ण आस्था है, भगवान की दिनरात पूजा अर्चना सेवा करनेवाला पुजारी मन्दिर से चोरी करने की बात कभी सपने में भी नहीं सोच सकता लेकिन जिनकी पूजापाठ में कोई रुचि ही नहीं वैसे लोगों को मन्दिर की व्यवस्था में जोड़ेंगे तो गड़बड़ होगी ही। अयोध्या मंदिर में चोरी तो बहुत बड़ी बात है और उन पापियों को दण्ड मिलेगा इसमे कोई दो राय नहीं है लेकिन इस घटना को लेकर जिस तरह से सनातन पर हमले शुरू हो गए हैं वह चिंतनीय है। आज वे लोग भी छाती पीटकर हल्ला मचा रहे हैं जिन्हें न तो सनातन में आस्था थी और न ही भगवान श्रीराम में। उन्होंने तो राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। कुछ लोग इस घटना के बाद भगवान को झूठे बोलकर कह रहे हैं की भगवान होते तो चोरी होती क्या? अरे! भगवान ने न तो कभी किसी चढ़ावा चढ़ाने को कहा और न ही उसकी रक्षा हेतु व्यवस्थापक रखने को। यह तो सरकारो ने मंदिर के चढ़ावे से मुफ्त की रेवड़ियां और सब्सिडी बांटने के लिए मंदिर को बैंक बना रखा है। मन्दिरों में चढ़ावे की देखरेख हेतु आफ़सर, बैंक कर्मी, मैनेजर और नौकर चाकर भर रखें है जिनकी न तो ईश्वर में आस्था होती है और न पाप का भय। उन्हें तो बस नोटो का पहाड़ दिखता है। चोरी सिर्फ मंदिर में तो हुई नहीं, जहाँ भी पैसों की बरसात होगी वहाँ चोरी लोग करेंगे ही। यह सामान्य कलयुगी मानवीय प्रवृति है। एक साधु संत तपस्वी ही इन चीजों से ऊपर है, उसे तो सिर्फ भगवान के भजन से मतलब है। इसमे आप आज के समृद्ध कथावाचकों को न जोड़आप बैंक लूट देखिए, अधिकांश मामलों में बैंक कर्मी मील होते हैं। सरकारी योजनाओं का हाल देखिए, मंदिरों से अधिक डाका तो सरकारी योजनाओं में पड़ता है, क्या मंत्री, क्या अफसर सभी अपने हिस्से की चोरी करने में लगे रहते हैं और यह सालों से चल रहा है। यूहीं तो कोई नेता साल दो साल में अरबो-खरबो का मालिक नहीं बन जाता? राम मंदिर में चोरी की घटना से किसी भी सच्चे सनातनी की आस्था और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आयी है क्योंकि चोरी-डकैती लूटपाट हर जगह हो रही है भला इससे एक भक्त और भगवान के बीच की आस्था कैसे टूटने लगी? जो भी दान चढ़ावा करते हैं वे यह सोचकर नही करते की उसका क्या उपयोग होगा? वह तो अपनी श्रद्धा से अपनी कमाई का एक छोटा सा हिस्सा भगवान की चरणों मे समर्पित कर देता है इस भावना के साथ कि- "तेरा तूझको अर्पण क्या लागे मेरा" जब सबकुछ ईश्वर का ही है तो उस दान, चढ़ावे का दिखावा और अफ़सोस कैसा? पंकज प्रियम

About Our Trust

साहित्य कला और संस्कृति का अनूठा संगम है, जहाँ हर किसी को अपनी प्रतिभा दर्शाने का भरपूर अवसर मिलता है। एक ऐसा वैश्विक मंच जहाँ लब्धप्रतिष्ठ हस्ताक्षरों के साथ-साथ गुमनाम और नवोदित-नवांकुरों को भी उन्मुक्त गगन मिलता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में रहकर हर तरह की स्वरचित मौलिक रचनाएँ स्वीकार्य है। मौलिकता ही साहित्योदय की पहचान है। साहित्योदय को अबतक 5 वर्ल्ड रिकार्ड प्राप्त है और वर्ल्ड बुक में शामिल है. साहित्योदय, साहित्य कला और संस्कृति को समर्पित एक पंजीकृत संस्था है जिसमें विश्व के हजारों लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार, कलाकार, संस्कृतिकर्मी सहित अनेक गणमान्य लोग जुड़े हैं। भारतीय भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित इस संस्था ने अबतक 3 हजार से अधिक नवोदित और आर्थिक- सामाजिक रूप से कमजोर रचनाकारों को मंच प्रदान किया है। जिसमे 80 प्रतिशत घरेलू महिला रचनाकारों को वैश्विक मंच दिया गया है. जो घर के कामकाज के समय निकाल कर किचन से सृजन तक के सफर में जुड़ रही हैं. साहित्योदय ने कोरोना काल में सोशल मीडिया को माध्यम बनाकर ऑनलाइन कवि सम्मेलन की शुरुआत कर अवसादग्रस्त रचनाकारों और घरेलू महिलाओं को सृजन कार्य से जोड़ा। कोरोना काल को सृजन काल में परिवर्तन कर साहित्य को एक नया आयाम दिया। कवि सम्मेलन के साथ- साथ साहित्योदय पत्र और पत्रिकाओं का भी प्रकाशन कर रहा है। अबतक एक दर्जन से अधिक पुस्तकों और मासिक पत्रिका 'साहित्योदय' का प्रकाशन किया जा रहा है। ऑनलाइन कार्यक्रमों के साथ ही देश के विभिन्न तीर्थ और पर्यटन स्थलों पर मंचीय साहित्य सम्मेलनों का भी आयोजन किया जा रहा है।

Our Mission

Our Mission Core

साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन तथा प्रचार-प्रसार के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त मंच प्रदान करना; नवोदित और वरिष्ठ रचनाकारों को समान अवसर देना; भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना; तथा रचनात्मक गतिविधियों, प्रकाशनों, साहित्यिक आयोजनों, प्रशिक्षण, शोध एवं सामाजिक सरोकारों के माध्यम से एक जागरूक, संवेदनशील और सृजनशील समाज के निर्माण में योगदान देना।

Our Vision

Our Vision Core

साहित्य, कला और संस्कृति के माध्यम से एक ऐसे संवेदनशील, सृजनशील और संस्कारवान वैश्विक समाज का निर्माण करना, जहाँ प्रत्येक रचनाकार को सम्मान, अभिव्यक्ति का स्वतंत्र मंच और अपनी प्रतिभा को निखारने का समान अवसर प्राप्त हो।

साहित्योदय का लक्ष्य भारतीय भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण एवं संवर्धन करते हुए उन्हें आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप विश्व पटल पर प्रतिष्ठित करना है। हम साहित्य को केवल शब्दों का सृजन नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन, मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय चेतना और वैश्विक सद्भाव का सशक्त माध्यम मानते हैं।

Founder Message
Official Desk Message

"प्रिय साहित्य साधकों, कला प्रेमियों एवं संस्कृति उपासकों,

साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रकाश है, कला उसकी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है और संस्कृति उसकी पहचान। जब ये तीनों एक साथ आगे बढ़ते हैं, तभी एक सभ्य, सशक्त और संस्कारित समाज का निर्माण होता है। इसी विश्वास और संकल्प के साथ साहित्योदय – अंतरराष्ट्रीय साहित्य कला संस्कृति न्यास (पंजीकृत) की स्थापना की गई।

साहित्योदय केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक ऐसा सृजनात्मक परिवार है जो शब्दों की शक्ति, कला की गरिमा और संस्कृति की समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए समर्पित है। हमारा उद्देश्य हर उस प्रतिभा को मंच देना है जिसके पास विचार हैं, संवेदनाएँ हैं और समाज के लिए कुछ सकारात्मक करने का संकल्प है।

हम मानते हैं कि साहित्य का दायित्व केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना, मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करना, राष्ट्रीय चेतना को जागृत करना और विश्व बंधुत्व की भावना को विकसित करना भी है। इसलिए हमारा प्रयास रहेगा कि साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट रचनात्मक कार्यों को प्रोत्साहन मिले तथा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत विश्व पटल पर और अधिक प्रतिष्ठित हो।

मैं सभी साहित्यकारों, कवियों, लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और संस्कृति प्रेमियों से विनम्र आग्रह करता हूँ कि वे इस सृजन-यात्रा में हमारे सहभागी बनें। आइए, हम सब मिलकर शब्दों से संस्कार, सृजन से परिवर्तन और संस्कृति से मानवता का ऐसा दीप प्रज्वलित करें, जिसकी रोशनी आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचे।

आइए, सृजन को उत्सव बनाएँ और साहित्य को समाज की सबसे बड़ी शक्ति बनाएँ।

सादर,

पंकज प्रियम
संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष
साहित्योदय – अंतरराष्ट्रीय साहित्य कला संस्कृति न्यास (पंजीकृत)"

— पंकज प्रियम

Trust Chairman / President

Our Board Members

Core Leadership Panel

KISHORI KUMARI

Executive Director

Shri Bhagwat Pathak

Trustee

Dr. Buddhinath Mishra

Sanrakshak

KISHORI KUMARI

Executive Director

Shri Bhagwat Pathak

Trustee

Dr. Buddhinath Mishra

Sanrakshak

Our Executive Committee

Dedicated Trustees & Volunteers Panel

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KISHORI KUMARI

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Our Objectives

राष्ट्रनिर्माण

1. साहित्य, कला और संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन करना। 2. नवोदित एवं वरिष्ठ रचनाकारों को समान अवसर और सम्मान प्रदान करना। 3. भारतीय भाषाओं तथा लोक साहित्य को प्रोत्साहित करना। 4. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित करना। 5. पुस्तकों, पत्रिकाओं एवं डिजिटल माध्यमों से उत्कृष्ट रचनाओं का प्रकाशन और प्रसार करना। 6. युवा पीढ़ी में पठन-पाठन, लेखन और सृजनात्मक चिंतन को बढ़ावा देना। 7. समाज में मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समरसता और विश्व बंधुत्व की भावना को सुदृढ़ करना। 8. साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों एवं संस्थाओं को सम्मानित करना।

Active Relief Campaigns

Urgent Support Mission

No active relief campaigns live.
Our Programs

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माँ कामाख्या दुर्गायन साहित्योत्सव २०२६

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SAHITYODAY TITLE SONG

मरना होता तो आप पर मरता

सुनील साहिल || SUNIL SAHIL

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गुवाहाटी में होगा दुर्गायन महोत्सव का आयोजन

समस्त नारी शक्तिओं को केन्द्रित महाकाव्य ग्रन्थ दुर्गायन का भव्य लोकार्पण गुवाहाटी स्थित महाशक्तिपीठ माँ कामाख्या के दरबार में होगा जहाँ देश -विदेश के सैकड़ो रचनाकार, कवि, कलाकार और गणमान्य अतिथि उपस्थित होंगे. तिथि की घोषणा जल्द की जाएगी. इस आयोजन में बतौर सहभागी, प्रायोजक या प्रतिभागी, आप शीघ्र संपर्क करें.

26 Jun, 2026
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